Corruption Essay in Hindi

corruption essay in hindi

भ्रष्टाचार दो शब्दों से मिल कर बना है भ्रष्ट+आचार। भ्रष्ट यानी बुरा या बिगड़ा हुआ तथा आचार का मतलब है आचरण। अर्थात भ्रष्टाचार का आसान भाषा मे अर्थ है वह आचरण जो किसी भी प्रकार से अनैतिक और अनुचित हो।
जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था के मान्य नियमों के विरूद्ध जाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गलत कार्य करने लगता है तो वह व्यक्ति भ्रष्टाचारी कहलाता है। आज भारत जैसे सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश में भ्रष्टाचार अपनी जड़े फैला रहा है बल्कि यू कहे की फैल चुका है । आज भारत में ऐसे कई व्यक्ति मौजूद हैं जो भ्रष्टाचारी है। आज पूरी दुनिया में भारत भ्रष्टाचार के मामले में 80वें स्थान पर है। भ्रष्टाचार के कई रंग-रूप है जैसे रिश्वत, काला-बाजारी, जान-बूझकर दाम बढ़ाना, पैसा लेकर काम करना, सस्ता सामान लाकर महंगा बेचना आदि। भ्रष्टाचार के कई कारण है।
भ्रष्टाचार में मुख्य घूस यानी रिश्वत, चुनाव में धांधली, ब्लैकमेल करना, टैक्स की चोरी, झूठी गवाही, झूठा मुकदमा, परीक्षा में नकल करना, परीक्षार्थी का गलत मूल्यांकन करना, हफ्ता वसूली, जबरन चंदा लेना, न्यायाधीशों द्वारा पक्षपातपूर्ण निर्णय, पैसे लेकर वोट देना, वोट के लिए पैसा लेना और शराब आदि बांटना, पैसे लेकर रिपोर्ट छापना, अपने कार्यों को करवाने के लिए नकद राशि देना यह सब भ्रष्टाचार ही है।
भ्रष्टाचार का बढ़ता स्वरूप-भारत के सामाजिक जीवन में आज भ्रष्टाचार का बोलबाला है। यहाँ का रिवाज़ है-रिश्वत लो और पकड़े जाने पर रिश्वत देकर छूट जाओ। नियम और कानून की रक्षा करने वाले सरकारी कर्मचारी सबसे बड़े भ्रष्टाचारी हैं। केवल तीन करोड़ में देश के सांसदों को खरीदना और उनका बिकना भ्रष्टाचार का सबसे शर्मनाक दृश्य है।
भ्रष्टाचार का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर बहता है। जब मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री स्वयं भ्रष्टाचार या घोटाले में लिप्त होंतो उस देश का चपरासी तक भ्रष्ट हो जाता है। भारत इस दुर्दशा से गुजर चुका है। इसीलिए सरकारी कार्यालयों में बिना घूस दिए कोई काम नहीं होता। फर्जी बिल बनाए जाते हैं। बड़े-बड़े अधिकारी कागजों पर सड़कें, पुल आदि बनाते हैं और सारा पैसा खुद खा जाते हैं। सरकारी सर्वेक्षण बताते हैं कि किसी भी योजना के लिए दिया गया 85% पैसा तो अधिकारी ही खा जाते हैं।
एक नियमित व्यवस्था-अब तो प्रीमियम, डोनेशन, सुविधा-शुल्क या नए-नए नामों से भ्रष्टाचार को व्यवस्था का अंग बना दिया गया है। कहने का अर्थ है कि सरकार तक ने इसे स्वीकार कर लिया है। इसलिए व्यापारियों और व्यवसायियों का भी यही ध्येय बन गया है कि ग्राहक को जितना मर्जी लूटो। कर्मचारी ने भी सोच लिया है-खूब रिश्वत लो और काम से बचो।
भ्रष्टाचार मनुष्यों की बदनीयती के कारण बढ़ा और उसमें सुधार करने से ही यह ठीक होगा। समाज के नियमों का पालन करने के लिए परिवार तथा विद्यालय में संस्कार दिए जाने चाहिए। दूसरे, प्रशासन को स्वयं शुद्ध रहकर नियमों का कठोरता से पालन कराना चाहिए। हर भ्रष्टाचारी को उचित दंड दिया जाना चाहिए ताकि शेष सबको बाध्य होना पड़े। प्रश्न यह है कि ऐसा कब हो पाएगा ? आज वर्षों बाद भारत में ऐसी सरकार आई है जिसके नेता और मंत्री बेदाग होकर दिन-रात कार्य कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार की हर खोखर को बंद कर रहे हैं। गरीबों के हिस्से का पैसा सीधे उन्हीं के खातों में डालने की व्यवस्था कर रहे हैं। काले धन वालों पर नकेल कस रहे हैं। लेकिन अभी शुरुआत है। एक संभावना जगी है। यदि यह सरकार इसी इरादे से 10-15 साल काम करती रही तो भ्रष्टाचार-रहित होना एक संस्कार बन सकता है। देखते हैं, आगे क्या होता है।
अंत मे हमारी आपसे यही गुजारिश रहेगी की न ही किसी से रिश्वत ले नहीं किसी को रिश्वत दे | रिश्वत हमारे देश को अंदर से खोखला कर देता है| मेहनत करे और मेहनत का खाए।

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